GPS से मंज़िल हुई आसान, जाने इसकी पूरी तकनीक। ~ मेनका चौधरी

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आज की तारीख में खाना,कपड़ा,इलैक्ट्रोनिक,राशन और तमाम चीज़े हमारी लोकेशन को ट्रैक करके हम तक आसानी से पहुंच जाती है और इसके पीछे होता है GPS.
GPS (global positioning system) की शुरुवात होती है 1973 से उस वक्त जब अमेरिका और रशिया के बीच में कोल्ड वॉर चल रही थी,और देखने वाली बात यह भी है कि अमेरिका और रशिया के बीच कोल्ड वॉर के चलते ही हम लोग स्पेस में इतना आगे जा पाए,क्योंकि इसी दौर में दोनों देशों के बीच कोल्ड वॉर के साथ साथ स्पेस वॉर भी चल रही थी।
तो GPS असल में 24 सैटेलाइट का एक नेटवर्क है जो दिन के 24 घंटे और साल में 365 दिन धरती के चक्कर लगाते रहते हैं,और शुरुवात में GPS को अमेरिकन एयरफोर्स के कुछ स्पेसिफिक कामों में मदद करने के हिसाब से बनाया गया था,जैसे सोल्जर्स को ट्रैक करना,मिसाइल लॉन्चिंग के समय होने वाली कैल्कुलेशन को इज़ी तौर पे करना आदि।
आम जनता को  के GPS बारे में पता चला 1989 में, उस वक्त जब  GPS सिस्टम के सेकंड जनरेशन वाले सैटेलाइटस को लांच किया गया और पब्लिक के लिये इस सिस्टम को पूरी तरह से ओपन किया गया सन 2000 में वैसे इससे पहले, साल 1976 में सोवियत यूनियन भी अपना खुद का नेविगेशन बनाने वाले प्रोग्राम को शुरू कर चुका था,लेकिन उनका यह प्रोग्राम खत्म हुआ 1995 में और सोवियत यूनियन ने अपना पहला नेविगेशन सैटेलाइट लांच किया था 1982 को।

एक्चुली यह 24 से थोड़े ज़्यादा सैटेलाइट होते हैं,अभी 31 सैटेलाइट के आसपास हैं, लेकिन 24 ऐसी सैटेलाइट होती हैं जो हमेशा ऑपरेशनल रहती हैं, बाकी की एज़ ए बैक अप यूज़ होती हैं,जैसे कोई खराब हो या तकनीकी फ़ॉल्ट आये तो उन्हें रिप्लेस कर सकें।
तो भले ही यह 24 सैटेलाइट 24 घंटे धरती के चक्कर लगाते रहते हों,लेकिन इन्हें इस तरह से प्लेस किया जाता है कि आप धरती के किसी भी कोने में हो,आपको हमेशा इनमें से किसी चार सैटेलाइट से सिग्नल मिलते रहें और देखा जाए तो इनमें से कोई सैटेलाइट हम लोगो को ट्रैक नही कर सकता,क्योंकि इन सैटेलाइट के अंदर कुछ भी ऐसा सिस्टम नही लगा जो धरती पर मौजूद किसी भी चीज़ को ट्रैक कर सके,असल में यह सैटेलाइट कोस्टेन्टली यानी कि कुछ कुछ सेकंड की डिस्टेंस पे अपनी आई डी,धरती से अपनी हाइट,अपनी पोजिशन, बाकी की तमाम सैटेलाइट की पोज़िशन और एग्जेक्ट टाइम का डेटा माइक्रोवेव की मदद से धरती पर भेजते रहते हैं।
और यहाँ धरती पे हमारे मोबाइल और डेडिकेटेड gps डिवाइस के अंदर लगे हुए रिसीवर्स उस डेटा की मदद से लेटिट्यूड और लोंगिट्यूड को फिगर आउट करते हुए यह पता लगाते हैं कि इस वक्त हमारी करंट पोज़िशन क्या है,लेकिन इस पूरी कैलकुलेशन का सबसे ज़रूरी हिस्सा होता है टाइम,क्योंकि यह तमाम सैटेलाइट तकरीबन 12 हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चक्कर लगाते हैं इसलिए इनपे लगी क्लॉक का सुपर एक्यूरेट होना बेहद ज़रूरी है,अगर ज़रा भी टाइम बदला तो डेटा किसी काम का नही।
यह सैटेलाइट धरती से तकरीबन 24 हज़ार किलोमीटर ऊंचाई पर होती हैं  और वहाँ से डेटा आने में पृथ्वी तक नैनो सेकेंड्स का समय तो लगता ही है,इसीलिये तमाम सैटेलाइट टाइम कैलकुलेशन के लिए एटॉमिक क्लॉक का इस्तेमाल करतीं हैं जो कि CAESIUM  133 एटम के वाइब्रेशन को एक सेकेंड के तकरीबन 9.1 बिलियन हिस्से तक जाके मेज़रमेन्ट करते हुए,टाइम का कैलकुलेशन करती है।
और इस तरह इन सैटेलाइट्स को सुपर एक्यूरेट टाइम मिलता है लेकिन हमारे यानी कि इंडिया के नेविगेशन सिस्टम यानी के NAVIK के अंदर सबसे बड़ी प्रॉब्लम यह एटॉमिक क्लॉक ही है लेकिन अभी रिसेंटली आई न्यूज़ के हिसाब से इसरो ने इस समस्या को हल कर लिया है बट इंडिया का नेविगेशन सिस्टम ग्लोबल नही है, बल्कि चाइना की तरह सिर्फ रीजनल है जो कि सिर्फ हमारे एरिया के ही अंदर नेविगेशन फैसिलिटी प्रोवाइड करता है।
अब सवाल यह उठता है कि GPS  के होते हुए हमने हमारा नेविगेशन सिस्टम क्यो बनाया, तो भले ही GPS  आज की तारीख में फ्री होने के साथ साथ पूरी दुनिया के लिए अवेलेबल हो लेकिन GPS के ऊपर मालिकाना हक है अमेरिकन सरकार का,और GPS सिस्टम को रन और मेंटेन करने का काम करती है अमेरिकन एयरफोर्स जो कि हमारी आर्मी की प्रायवेसी के लिये ठीक नही है इसलिए हमने हमारा अलग नेविगेशन बनाया है,इतना ही नही आज की तारीख में अमेरिका, चाइना, जापान, रशिया, भारत और यूरोपियन यूनियन इन तमाम देशों के पास सबका अपना नेविगेशन सिस्टम है लेकिन इंडिया चाइना और जापान का नेविगेशन सिस्टम रीजनल है और एक बात नेविगेशन सिस्टम का अपना खुद का रक नेटवर्क होता है मतलब वो किसी तरह से और किसी नेट पे निर्भर नही होता।
तो अगली बार जब आप GPS  ऑन करेंगे तो सोचिएगा कितना कुछ है इस तकनीक के पीछे……….
 –मेनका चौधरी 

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