हिंदी दिवस पर पढ़िए हिंदी की पांच बेहद ही खुबसुरत रचनाएं

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आज हिंदी दिवस है। आज ही क्यों है? क्योंकि आज ही के दिन आजादी के दो साल बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में एक मत से हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया था और इसके बाद से ही हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। हिंदी की स्थिति पर व्यंग्य कसते हुए प्रख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने लिखा था- हिंदी दिवस के दिन हिंदी बोलने वाले लोग, हिंदी बोलने वालों से कहते है कि हिंदी बोलना चाहिए। यह तो रही व्यंग्यकार की बात लेकिन हमारे यहां कई नामी-गिरामी कवियों ने हिंदी को लेकर बहुत-सी खुबसुरत रचना लिखी हैं। चलिए आज हिंदी दिवस के दिन हम हिंदी के कवियों द्वारा हिंदी को लेकर दर्शाए गए प्रेम का उतने ही प्रेम से रसपान करते हैं।

1)भिक्षुक

वह आता –
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता|
पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी-भर दाने को-भूख मिटाने को
मुँह फटी-पुरानी झोली का फैलता –
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता|

साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये ,
बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया-दृष्टि पाने की ओर बढ़ाए|
भूख से सूख ओंठ जब जाते,
दाता-भाग्य-विधाता से क्या पाते?
घूँट आँसूओं के पीकर रह जाते|

चाट रहे जूठी पत्तल वे कभी सड़क पर खड़े हुए ,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए|
ठहरो, अहो मेरे हृदय में है अमृत,
मैं सींच दूंगा|
अभिमन्यु जैसे हो सकोगे तुम
तुम्हारे दुःख मैं अपने हृदय में खींच लूँगा|

~ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

2) भूख इ तो सब्र कर

भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुदद्आ ।

मौत ने तो धर दबोचा एक चीते कि तरह
ज़िंदगी ने जब छुआ तो फ़ासला रखकर छुआ ।

गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नही
पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बददुआ ।

क्या वज़ह है प्यास ज्यादा तेज़ लगती है यहाँ
लोग कहते हैं कि पहले इस जगह पर था कुँआ ।

आप दस्ताने पहनकर छू रहे हैं आग को
आप के भी ख़ून का रंग हो गया है साँवला ।

इस अंगीठी तक गली से कुछ हवा आने तो दो
जब तलक खिलते नहीं ये कोयले देंगे धुँआ ।

दोस्त, अपने मुल्क कि किस्मत पे रंजीदा न हो
उनके हाथों में है पिंजरा, उनके पिंजरे में सुआ ।

इस शहर मे वो कोई बारात हो या वारदात
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ ।

~दुष्यन्त कुमार त्यागी

हिंदी के महत्व को दर्शाती ‘राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त जी’ कविता आप सबके लिए।

3) करो अपनी भाषा पर प्यार ।
करो अपनी भाषा पर प्यार ।
जिसके बिना मूक रहते तुम, रुकते सब व्यवहार ।।

जिसमें पुत्र पिता कहता है, पत्नी प्राणाधार,
और प्रकट करते हो जिसमें तुम निज निखिल विचार ।
बढ़ाओ बस उसका विस्तार ।
करो अपनी भाषा पर प्यार ।।

भाषा बिना व्यर्थ ही जाता ईश्वरीय भी ज्ञान,
सब दानों से बहुत बड़ा है ईश्वर का यह दान ।
असंख्यक हैं इसके उपकार ।
करो अपनी भाषा पर प्यार ।।

यही पूर्वजों का देती है तुमको ज्ञान-प्रसाद,
और तुम्हारे भी भविष्य को देगी शुभ संवाद ।
बनाओ इसे गले का हार ।
करो अपनी भाषा पर प्यार ।।

~ मैथिली शरण गुप्त

4) हिंदी

पुरस्कारों के नाम हिन्दी में हैं
हथियारों के अंग्रेज़ी में
युद्ध की भाषा अंग्रेज़ी है
विजय की हिन्दी

– रघुवीर सहाय

कविराज बुद्धिनाथ मिश्रा जी की बहुत सुंदर कविता का रस आप भी लीजिये…..

5) तुम बदले

तुम बदले, सम्बोधन बदले
लेकिन मन की बात वही है ।
जानें क्यों मौसम के पीछे
दिन बदले, पर रात वही है ।

यह कैसा अभिशाप — चाँद तक
सागर का मनुहार न पहुँचे
नदी-तीर एकाकी चकवे का
क्रन्दन उस पार न पहुँचे ।
तन की तृषा झुलसकर सोई
मन में झंझावात वही है।

तुम्हें नहीं मालूम कि कैसे
भर जाता नस-नस में पारा
उड़ते हुए मेघ की छाया-सा
पलभर का मिलन तुम्हारा ।
तृप्ति नहीं मरुथल को, यद्यपि
प्यास वही, बरसात वही है ।

जितना पुण्य किया था, पाया
साथ तुम्हारा उतने दिन का
तुम बिछड़े थे जहाँ, वहीं से
पंथ मुड़ गया चंदन वन का ।
सब कुछ बदले, पर अपने संग
यादों की बारात वही है ।

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