सवर्ण आंदोलन का वह सकारात्मक पहलू जिसे ज्यादातर मीडिया संस्थानों ने नजरंदाज किया

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भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति और मिसाईल मैन अब्दुल कलाम जी की भारतीय मीडिया से हमेशा यह शिकायत रही कि यहां का मीडिया सिर्फ नेगेटिव चीजों को ही खबर कहलाने का दर्जा देता है। इसलिए अखबारों के पन्नों पर देश में घटने वाली सिर्फ गलत चीजें ही खबर बनकर छपती है और देश मे होने वाली अच्छी चीजें छिप जाती है। मीडिया का यह नकारात्मक रवैया आज भी कायम है। इसका ताजा उदाहरण 6 सितंबर को एससी एसटी एट्रोसिटी एक्ट में बगैर किसी जांच और पड़ताल के सिर्फ आरोप के आधार पर अभियुक्त की तुंरत गिरफ्तारी वाले प्रावधान के खिलाफ सवर्णों के भारत बंद के दौरान भी देखने को मिला।
Image result for sc st actमीडिया संस्थानों ने दिनभर इस आंदोलन से जुड़ी नकारात्मक खबर तो खूब दिखाई। लेकिन, उत्तरप्रदेश के बांदा जिले में कैसे सवर्ण आंदोलनकारियों ने मरीज को अस्पताल ले जा रहे एंबुलेंस के लिए आंदोलन को कुछ देर के लिए रोककर रास्ता और इस दौरान नारेबाजी तक बंद कर दी, यह दिखाने प्रमुखता से दिखाने कष्ट किसी मीडिया संस्थान ने नही किया। अगर मीडिया द्वारा सवर्णों के आंदोलन का यह पक्ष भी प्राथमिकता के साथ दिखाया जाता तो शायद इस आंदोलन से सीख लेते हुए भविष्य में लोग इसका अनुसरण भी करते।
जैसा कि हमने पहले ही बताया कि भारतीय मीडिया की नजरों में सिर्फ नकारात्मक चीजें ही खबर लायक होती है। यह इस बात से सिद्ध हो जाता है कि अगर बांदा जिले में उस दिन आंदोलन की वजह से एंबुलेंस फंस जाती(जैसा कि अक्सर होता है) और मरीज के साथ कोई अनहोनी हो जाती, तो हमारा मीडिया इस खबर को दिन-रात दिखाकर आंदोलनकारियों के खिलाफ मैदान-ए-जंग का ऐलान कर दिया होता। अब क्योंकि अच्छी और सकारात्मक चीजें हमारी मीडिया के लिए बड़ी खबर और ब्रेकिंग न्यूज की श्रेणी में नही आती। इसलिए इस तरह की खबर पर कोई डिबेट या विशेष शो नही होता बल्कि ऐसी खबरों का जीवनकाल स्पीड न्यूज़ के स्लॉट में 6 से  7 सेकंड भर का होता है।
~ रोशन ‘सास्तिक’

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