समाज में शिक्षकों की प्रतिष्ठा को ‘पुनर्स्थापित’ कर रहे है पांच शिक्षकों की कहानी

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भारत पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की मृत्यु के पश्चात साल 1962 में देश के राष्ट्रपति बने डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन का आज जन्मदिन है और उनके जन्मदिन को भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज जब हम महान शिक्षाविद् और शिक्षक के रूप में जग प्रसिद्ध राधाकृष्णन के जन्मदिन पर शिक्षक दिवस मना रहे है, तब चलिए जानते है भारत के उन शिक्षकों के बारे में जो वर्तमान में अपनी शिक्षा से ना सिर्फ बच्चों का भविष्य संवार रहे है बल्कि निःस्वार्थ भाव से काम कर समाज में ‘शिक्षक’ की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने का काम भी बखूबी कर रहे है।

सर्वेष्ट मिश्रा:-
एक कहावत है- अकेला चना भाड़ नही फोड़ सकता। कई मामलों में यह कहावत एकदम सही भी है, लेकिन उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में एक सरकारी प्राथमिक स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक सर्वेष्ट के सामने इस कहावत की सार्थकता समाप्त हो जाती है। क्योंकि सर्वेष्ट मिश्रा वह शिक्षक है जिन्होंने अपने दम पर बस्ती के एक सरकारी प्राथमिक शिक्षा की दशा और दिशा दोनों बदल कर रख दी हैं। दो साल पहले जिस स्कूल में कभी सिर्फ 19 बच्चें पढ़ा करते थे, आज सर्वेष्ट मिश्रा के प्रतिभा और प्रयासों के परिणामस्वरूप वहां 235 बच्चें शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। पढ़ाने की मॉर्डन तकनीकों का इस्तेमाल कर बस्ती के एक सरकारी स्कूल को प्राइवेट स्कूल से भी बेहतर बना देने वाले सर्वेष्ट मिश्रा को इस साल शिक्षक दिवस पर सर्वश्रेष्ठ शिक्षक के रूप में सम्मानित किया जाएगा।

आसरा एनजीओ-
हम सभी को जीवन में किसी न किसी के आसरे की सख्त जरूरत होती है। उत्तराखंड के देहरादून में सड़कों पर घूमकर भीख मांगने और कचरा चुनने को मजबूर बच्चों के लिए आसरा नाम का एक एनजीओ उनका आसरा बनी हुई है। आसरा एनजीओ झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों को शिक्षित करने का काम करता है। सिर्फ इतना ही नही तो गंदी गलियों में घूम रहे बच्चों को लाना, उनकी की साफ-सफाई करना, उन्हें ढंग के कपड़े पहनना, उनके बाल बनाना इत्यादि काम करके उन्हें शिक्षा दिलाने का काम किया जाता है। आसरा एनजीओ द्वारा पहले यह काम सड़क के किनारे किया जाता था, लेकिन अब आसरा एनजीओ को स्थानीय पुलिस चौकी का आसरा मिल गया है और बच्चों को पढ़ाने का काम अब पुलिस स्टेशन के भीतर ही होता है।
वीरेंद्र सिंह राठौर:-
सवाल यह नही की आपके पास क्या नही है बल्कि मायने तो यह रखता है कि आपके पास क्या है। मध्यप्रदेश के रायसेन में वीरेंद्र सिंह राठौर नाम के एक ऐसे ही शिक्षक है, जो आंखों से देख तो नही पाते लेकिन ज्ञान की ज्योति जलाकर सरकारी स्कूल के बच्चों को उनके सुनहरे भविष्य की राह जरूर दिखा रहे है। आंखों से देख न सकने के कारण वीरेंद्र राठौर ब्रेन लिपि और ऑडियो लेक्चर की सहायता से अपना कोर्स तैयार कर बच्चों को नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाते है। पिछले 12 साल से नेत्रहीन वीरेंद्र सिंह राठौर के इन प्रयासों को खुद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी पुरस्कार देकर सम्मानित कर चुके है।
विमला डागा:-
कहते है काम और उम्र का कोई संबंध नही होता। क्योंकि कोई व्यक्ति काम करेगा या नही, यह उसकी उम्र नही बल्कि उसकी इच्छाशक्ति और लगन तय करती है। इस बात को साबित करने का काम राजस्थान के ब्यावर में 75 वर्षीय विमला डागा गरीब बच्चों को पढ़ाकर कर रही है। विमला डागा बताती है कि पहले वह झुग्गी में जाकर बच्चों को पढ़ाती थी और अब सरकारी स्कूल के बरामदे में बच्चों को हर शाम 4 से 6 शिक्षित करने का काम कर रहीं हैं। पिछले 11 सालों से गरीब बच्चों को मुफ्त में पढ़ा रही 75 वर्षीय विमला डागा को बच्चें प्यार से अम्मा बुलाते है। यही कारण है कि उनके स्कूल को लोग ‘अम्मा की पाठशाला’ भी कहते है। 8-10 बच्चों से शुरू हुआ उनका सफ़र आज 70 बच्चों को पढ़ाने तक पहुंच गया है।
मारा सान्द्रे:-
मनुष्यों के अक्सर यह प्रवृत्ति की पाई जाती है कि वो समस्याओं को देखकर उनसे बचने और दूर भागने की कोशिश करता हैं। लेकिन डोमिनिक रिपब्लिक ऑफ अमेरिका की रहने वाली मारा सान्द्रे का व्यक्तित्व कुछ अलग हैं। 2003 में अपने देश से हमारे देश घूमने के उद्देश्य से आई मारा में पयर्टन के दौरान देखा कि राजस्थान के अजमेर में पुष्कर इलाके में स्कूलों में लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या नगण्य थी। बस यही बात मारा को अखर गई और उन्होंने पुष्कर में लड़कियों के लिए स्कूल खोलने का निश्चय किया। उनका संकल्प इतना दृढ़ था कि उन्होंने ना सिर्फ पुष्कर में लड़कियों के लिए विशेष स्कूल की स्थापना की बल्कि पिछले 11 सालों से उस स्कूल में पढ़ा भी रहीं है। सच के सारा सिर्फ लड़कियों के लिए ही नही तो हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणास्रोत है जो मुसीबतों से लड़कर उसका समाधान ढूंढने की बजाय उसे देख कर उल्टे पैर लौट जाते है।

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