सबरीमाला मंदिर पर सर्वोच्च न्यायालय का सुप्रीम फैसला, अब हर महिला को मिलेगा मंदिर में प्रवेश

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सुप्रीम कोर्ट इन दिनों फूल फॉर्म में है। जी हां, पिछले कुछ दिनों से देश की सभी बड़ी खबरें सुप्रीम कोर्ट के प्रांगड़ से ही आ रही है। आर्टिकल 377 से लेकर आर्टिकल 497 तक सुनाए गए ऐतिहासिक फैसलों के सफ़र में आज एक और नई कड़ी जुड़ गई है। सुप्रीम ने आज अपने एक और ऐतिहासिक फैसले में सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगाई गई पाबंदी को असंवैधानिक बताकर हटा दिया है।
धार्मिक परंपरा के नाम पर 10 से 50 साल की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर लगाए गए रोक को हटाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पूजा करने का अधिकार भगवान के सभी भक्तों को है और किसी को यह अधिकार नहीं है कि वो लिंग के आधार यह तय करे कि कौन भगवान के मंदिर के प्रवेश करेगा और कौन नही। इस मामले में फैसला सुनाने वाली संवैधानिक पीठ के अध्यक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि महिलाएं पुरुषों से कहीं भी कमजोर नहीं हैं और शरीर के आधार पर उनके साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता।

आपकों बता दें कि भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद पर आसीन दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में न्यायाधीश ए एम खानविलकर, न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायाधीश आर एफ नरीमन और न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा की पांच सदस्यों वाली संविधान पीठ ने इस मुद्दे पर आठ दिनों तक सुनवाई के बाद एक अगस्त को इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। आज शुक्रवार को पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने 4-1 से अपना फैसला सुनाते हुए सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी को खत्म कर दिया। पांच जजों में से चार जज सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी के खिलाफ थे, वहीं अकेले न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा इस मामले में स्थिति को जस का तस बनाए रखने के पक्ष में थी।
सबरीमाला मंदिर में धार्मिक परंपरा के नाम पर महिलाओं के प्रवेश पर लगाए प्रतिबंध को लेकर न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा का मानना था कि किसी मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी लैंगिक भेदभाव नहीं बल्कि एक धर्मविशेष की अपनी स्थापित मान्यता है, जिसमें कोर्ट को दखलअंदाजी नही करनी चाहिए। किसी धर्म की पूजा पद्धति क्या होगी यह उस धर्म के लोग तय करेंगे ना कि कोर्ट। पांच जजों की संवैधानिक पीठ के चार अन्य जजों से एकदम अलग राय रखते हुए इंदु मल्होत्रा ने कहा कि हम किसी भी धार्मिक परंपरा का केवल समानता के अधिकार के आधार पर परीक्षण नहीं कर सकते। धार्मिक रूप से कौन-सी परिपाटी जरूरी है, इसका फैसला कोर्ट नही बल्कि धर्मविशेष के श्रद्धालु करेंगे। उन्होंने कहा,”सुप्रीम कोर्ट का आज का फैसला केवल सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसका व्यापक असर होगा।”
Image result for इंदु मल्होत्रासुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला इंडियन यंग लायर्स एसोसिएशन और अन्य द्वारा दायर की गई याचिकाओं पर आया। सबरीमाला मंदिर के केरल में स्थित होने के चलते इस मामले में केरल सरकार से भी अपना पक्ष रखने के लिए कहा गया था। शुरुआत में किसी भी नतीजे पर ना पहुंचती दिख रही केरल सरकार ने भी इसी साल 18 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के सामने यह स्पष्ट कर दिया था कि वो सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में हैं। केरल सरकार के अलावा सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ त्रावणकोर देवासम बोर्ड के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने अपनी दलील में यह कहा कि दुनियाभर में अयप्पा जी के कई मंदिर मौजूद हैं और वहां महिलाएं बिना किसी रोक-टोक के जा सकती हैं लेकिन सबरीमाला में ब्रह्मचारी देव की मौजूदगी की वजह से एक निश्चित उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध है।

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