विनोद खन्ना: सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद अध्यात्म की शरण में जाने वाले अभिनेता

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आज जन्मदिन है, एक ऐसे अभिनेता का- जिसने अपने अभियन के बल पर हिंदी सिनेमा में शोहरत की बुलंदियों को भी छूआ और जब इन सब से मन भर गया तो सफलता के शिखर पर मौजूद रहते हुए एक झटके में सब कुछ त्याग कर अध्यात्म या फिर कहें कि ओशो की शरण में भी चला गया। जी हां, हम बात कर रहे है हिंदी सिनेमा के उस अभिनेता की, जिसका नाम अपने समय के सबसे खूबसूरत अभिनेताओं में शुमार होता था। हम बात कर रहे हैं विनोद खन्ना की। जिन्हें अगर पिछले साल कैंसर ने अपना शिकार न बनाया होता, तो आज वह हम सभी के साथ अपना 72वां जन्मदिन मना रहे होते।
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6 अक्टूबर 1946 को जन्मे विनोद खन्ना का जन्म तो पेशावर, पाकिस्तान में हुआ। लेकिन, उनके जन्म के अगले साल यानी 1947 में हुए बंटवारे के बाद उनका परिवार पेशावर से मुंबई आ गया। पांच भाई-बहनों में एक विनोद खन्ना का शौक तो फिल्मों में काम करने का ही था। लेकिन टेक्सटाइल और केमिकल का बिजनेस करने वाले उनके पिता यह कभी नहीं चाहते थे कि उनका बेटा फिल्मों में अपना करियर बनाए। बावजूद इसके विनोद खन्ना किसी तरह अपने पिता जी को मनाने में कामयाब हो गए और फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाने के लिए उनसे 2 साल का वक्त मांग लिया।
Image result for विनोद खन्नाविनोद खन्ना ने इन 2 सालों में जमकर पसीना बहाया और अपने अभिनय के दम पर अपने लिए अंजान फ़िल्म इंडस्ट्री में खुद को स्थापित भी कर लिया। विनोद ने अपना फिल्मी सफर साल 1968 में सुनील दत्त स्टारर ‘मन का मीत’ फ़िल्म में खलनायक की भूमिका से शुरू किया। शुरुआत में उन्होंने आन मिलों सजना, पूरब और पश्चिम, सच्चा-झूठा जैसी फिल्मों में खलनायक की भूमिका ही निभाई। विनोद खन्ना फिल्मों में काम तो कर रहे थे, लेकिन इस लाइन में उन्हें असली सफलता साल 1971 में गुलजार द्वारा निर्देशित फिल्म ‘मेरे अपने’ से मिली।
Image result for विनोद खन्ना अक्षय खन्नाइसके बाद तो उनकी गाड़ी सफलता की सड़क पर बड़ी तेजी से आगे बढ़ने लगीं। विनोद खन्ना हिट पर हिट देते गए और हर हिट फिल्म के बाद फ़िल्म इंडस्ट्री और फिल्मी दर्शकों के बीच उनका कद और ज्यादा बढ़ता गया। इस दौरान उन्होंने ‘हेराफेरी’, ‘खून पसीना’, ‘अमर अकबर एंथोनी’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में भी की, जिसने उनके फिल्मी करियर को शिखर पर पहुंचा दिया। लेकिन सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद अचानक ही उन्हें अपने आसपास की दुनिया बनावटी नजर आने लगी। जिसके बाद उन्होंने फिल्मी चकाचौंध को सिर्फ मोहमाया मानकर संन्यास के दामन थाम लिया और ओशो की शरण में चले गए।
Image result for विनोद खन्ना अक्षय खन्नाहालांकि, ओशो के पास कुछ वक्त बिताने के बाद एक बार फिर उनका अतीत उन्हें बुलाने लगा और वह दोबारा बॉलीवुड की तरफ खींचे चले आए। 1987 में विनोद खन्ना ने ‘इंसाफ’ फ़िल्म से अपना कमबैक किया और 1990 तक फिल्मों में मुख्य भूमिकाएं निभाते रहे। 1990 के बाद विनोद खन्ना धीरे-धीरे मुख्य भूमिका की बजाय फिल्मों में चरित्र भूमिका निभाने लगे। राजमाता विजया राजे सिंधिया के जीवन पर पिछले साल अप्रैल में बनी फ़िल्म ‘एक थी रानी ऐसी भी’ में विनोद खन्ना ने आखिरी बार अभिनय किया था। 1999 में फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित होने वाले विनोद खन्ना ने 27 अप्रैल 2017 को कैंसर से लड़ाई हारने के बाद इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
~ रोशन ‘सास्तिक’

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