राष्ट्रपुरुष अटलजी -जे पी सिंह (विद्रोही)

54

गगन रो रहा है, धरा रो रही है।
साँसे अटल की शिथिल हो रही हैं।
वर्षों से उनका ना दीदार पाया,
कहाँ खो गए कुछ समझ में न आया।
कैसे मैं समझूँ ये क्या हो रहा है,
गगन रो रहा है, धरा रो रही है।
साँसें अटल की शिथिल हो रही हैं।।

प्रणेता कवि राजनेता थे वे,
निर्मल हृदय प्राण वक्ता थे वे।
जीवन जिया देश हित के लिए,
नहीं कुछ भी सोचे वे अपने लिए।
आज अपनों के ख़ातिर चले जा रहे हैं,
गगन रो रहा है, धरा रो रही है।
साँसें अटल की शिथिल हो रही हैं।।

एकाकी था जीवन न थी संगिनी,
रचना हृदय की बनी रागिनी।
वज्र से भी कठिन था संकल्प उनका,
वे सहारा बने देशहित में सभी का।
आज आँखें सभी की नम हो रही हैं,
गगन रो रहा है, धरा रो रही है।
साँसें अटल की शिथिल हो रही हैं।।

कठिन काल में वे झुकना न सीखे,
झुकाया उन्हीं को जो थे उनके सरीखे।
कहाँ तुम गए तुमको खोजें कहाँ,
लोग विह्वल हैं, कहते अटलजी कहाँ।
आज उनका जनाजा चला जा रहा है,
गगन रो रहा है, धरा रो रही है।
साँसें अटल की शिथिल हो रही हैं।।

मेरा तन-मन करता है शत शत नमन,
अटलजी को अर्पित है श्रद्धासुमन।।

प्रफ़ेसर- जे पी सिंह (विद्रोही)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here