रक्तदान – गाँधी सुभाष

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बिखरे से सपने

लिखने और जीने में
जिंदगी दो रंग क्यों है ?

रक्त जो बचाता है जिंदगी
आखिर वह बदरंग क्यों है ?

रक्तदान नहीं बात बड़ी है
सवाल बड़ा है कि जरूरत क्यों आन पड़ी है?

यह मानवता की बात है या
फिर दानवता मुँह बाए खड़ी है ?

किसने बहाया है रक्त
धर्म और जाति के नाम पर ?

खंजर लहू से रंगे हैं किसने
क्षेत्र – भाषा तकरार पर … !!

भूला नहीं हूँ मैं …..
देश के सीने पे हर एक वार को !

जलियाँवाला बाग से लेकर
उस बदुरिया की तकरार को .. !!

ऊँच – नीच के भेदभाव ने
कितनों का जीवन पीसा है ..?

भाई – भतीजावाद के चलते
हमने कितनों का लहू चूसा है ..?

खून बहाना औ खून चूसना
क्या कोई मजबूरी है ……?

फिर आखिर क्यों यह नारा
कि रक्तदान जरूरी है ….?

बो देंगे सद्भाव धरा पर
तो मानवता खुशहाल बनेगी..!

रक्तपात का आलम बंद हो
तो लहू की कमी न कभी खलेगी ..!!

अधरों पर महके जो तराने
हर दिल खिल मुस्काएगा … !!

लहू – लहू के लिए जीना सीखे
आखिर वो दिन कब आएगा .. ?

– गाँधी सुभाष

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