भारत को कांस्य पदक दिलाने वाले हरीश कुमार इंडोनेशिया से लौटकर दोबारा चाय बेचने पर हुए मजबूर

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​​मेहनत तो सभी करते है लेकिन सभी के मेहनत के साथ एक जैसा न्याय हो ऐसा जरूरी नही। उदाहरण के लिए हम इंडोनेशिया में इस बार हुए 18वें एशियन गेम्स में सेपकटकरा खेल में भारत को कांस्य पदक दिलाने वाले हरीश कुमार की ज़िंदगी मे झांक सकते है। एक तरफ तो एशियन गेम्स में पदक जीतने वाले खिलाड़ियों पर पैसा, प्यार और शौहरत की बारिश हो रही है, वहीं दिल्ली के हरीश कुमार को सरकार की बेरुखी का सूखा झेलना पड़ रहा है।

जी हां, दिल्ली के मजनू टीला में रहकर चाय की दुकान चलाने वाले 23 वर्षीय हरीश कुमार ने अपनी मेहनत, लगन और इच्छाशक्ति के बल पर भारत को सेपकटकरा जैसे खेल में कांस्य पदक तो दिला दिया। लेकिन अफसोस कि देश दिल्ली एयरपोर्ट से उन्हें उनके घर तक जाने के लिए एक बस तक का इंतजाम नही कर पाया। इतना ही नही तो सरकार अपने खिलाड़ियों की अनदेखी कर उनके मनोबल को रसातल में दफ़्न कर देने के लिए विजेता खिलाड़ियों के स्वागत में किसी सरकारी व्यक्ति को एयरपोर्ट पर भी नही भेजती।
आप लोगों को यह जानकर बहुत दुःख होगा कि हरीश कुमार और उनके साथियों को एयरपोर्ट से घर लाने के लिए उनके परिचितों ने ही चंदा इकट्ठा कर एक निजी बस का इंतजाम किया। लेकिन उस बस की हालत भी हमारे सरकारी व्यवस्था की तरह खस्ताहाल निकली। बस स्टार्ट होते ही बंद हो गई और फिर उस बस को खुद खिलाड़ियों ने ही धक्का मार कर शुरू किया। इसके बाद जैसे-तैसे हरीश कुमार अपने घर पहुंचे। वहां शाम तक जश्न का माहौल रहा और फिर दरवाजे पर हकीकत ने दस्तक दी। हकीकत यह कि घर चलाने के लिए मेडल और मान-सम्मान नही बल्कि पैसो की जरूरत होती है।

नतीजतन देश को एशियन गेम्स में सेपकटकरा सरीखे खेल में कांस्य पदक दिलाने वाले हरीश कुमार घर लौटकर आर्थिक मजबूरी के चलते दोबारा लोगों को चाय पिलाने में जुट गए। वैसे हरीश कुमार के लिए गुरबत कोई नई चीज नही है। उनका तो पूरा बचपन इसी में बीता है। पहले उनके पिता रिक्शा चलाकर घर चलाते थे और फिर जब हरीश को भी घर चलाने के लिए चाय के दुकान पर बैठना पड़ा। सुबह 6 बजे से दोपहर 2 बजे तक चाय बेचते और फिर दोपहर 2 बजे से शाम 6 बजे तक सेपकटकरा खेल की प्रैक्टिस करते थे। इसके लिए उनके कोच हेमराज ने उनकी बहुत मदद की। वह घर से स्टेडिम तक आने-जाने का किराया तक हरीश को अपनी जेब से देते थे।

इतना सब कुछ झेलने के बावजूद हरीश ने वह कारनामा कर दिखाया जो सफलता के लिए कथित रूप से सख्त जरूरी कॉम्प्लैन, हॉर्लिक्स और बूस्ट जैसे ड्रिंक पीने वाले बच्चें तक नही कर पाते। हालांकि, जैसा कि हमने पहली ही लाइन में कहा कि जिंदगी में किस्मत सभी के मेहनत के साथ एक जैसा न्याय नही करती। नतीजतन हरीश को सफलता का आसमान छू लेने के बावजूद दोबारा मजनू टीला की गलियों में लोगों को चाय पिलाना पड़ रहा है।

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