नहीं नहीं – डॉ मीरा त्रिपाठी पांडेय

167

नहीं नहीं नहीं …
मैं छुई मुई नहीं ।
मैं तो धधकती चिंगारी हूं,
मैं भारत की नारी हूं ।
नहीं नहीं…

अपनेपन में वारी हूं,
अपनेपन में हारी हूं ।
दिल में आग लगाती हूं,
दिल से आग बुझाती हूं ।
नहीं नहीं…

दिल से दिमाग का संयोजन करती हूं,
करती अाई हूं ।
रब से मेरा नाता है, नाते में अपनापन है ।
रीतेपन से दूरी है,
दूरी आग लगाती है ।
नहीं नहीं…

स्नेह की धार बहाती हूं ।
अमृत मैं बन जाती हूं ।
अग्निपरीक्षा से उत्तरिन्न हूं,
वसुंधरा में समाती हूं ।।
नहीं नहीं…

रोती हूं, जग खोती हूं ।
जल बन कर निर्मल होती हूं ।
उतनी ही शीतल होती हूं ।
अश्रु जल से मन धोती हूं ।
नहीं नहीं…

जल में मैं हूं ।
थल में मैं हूं ।
मन के हर दर्पण में मैं हूं ।
मैं तो मैं हूं, मैं से मैं हूं ।।
नहीं नहीं…

इतनी पावन काया मेरी ।
पावनता सी माया मेरी ।
तन मन के इस दर्पण पर,
विचलित होती छाया मेरी ।।
नहीं नहीं नहीं…
मैं छुई मुई नहीं ।।
डॉ मीरा त्रिपाठी पांडेय

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here