जन्मदिन विशेष: हमारे हर किए-धरे पर उग आएंगे ‘पाश’

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एक समय टीवी पर किसी कंपनी के कलम का एक एड आता था। जिसमें एक नेता पत्रकार को नीचा दिखाते हुए उससे पूछता, “क्या करोगे लिखकर?” इसके जवाब में पत्रकार बड़े स्वाभिमान से अपने लिखे हुए कागज को फाड़ते हुए कहता है,”हम क्या करेंगे सर, बस लिख कर ‘फाड़’ देंगे।” पत्रकार के इस अंदाज को देखकर नेता को कलम और लिखने की ताकत का अहसास हो जाता है। लेखनी की कुछ ऐसी ही अद्भुत शक्ति से दुनिया को रूबरू कराने वाले एक कवि हुए पाश, जिनका आज जन्मदिन है। 9 सिंबतर 1950 को आजाद भारत मे जन्में अवतार सिंह संधू दुनियाभर में ‘पाश’ नाम से मशहूर हुए।
अगर हम कहें कि पाश कविताएं लिखते थे तो यह शायद पाश के साथ अन्याय होगा। असल में पाश अपने आग उगलते शब्दों से सामाजिक चेतना को जलाए रखने का क्रांतिकारी काम करते थे। शायद इसलिए उनके आग की इस तपिश को कुछ खालिस्तान समर्थक बर्दाश्त नही कर पाए और पाश को उनकी कविताओं के लिए 23 मार्च 1988 में मौत के घाट उतार दिया। लेकिन मरने से पहले पाश में अपने 38 साल के जीवन में ऐसा कुछ और इतना कुछ लिख दिया कि आज अपनी मृत्यु के इतने साल बीत जाने के बावजूद वह उन्हें पढ़ने वाले लोगों की जुबान पर, उन्हें समझने वाले लोगों के दिमाग में और उन्हें पसंद करने वालों के दिल में जिंदा है और आगे भी रहेंगे।
क्योंकि जब भी कोई ‘सबसे खतरनाक क्या है?’ इस सवाल के जवाब की तलाश में निकलेगा तो उसे पाश की वह पंक्तियां अपने पास बुलाकर बताएंगी कि
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है
सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
गुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्‍याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में
मिर्चों की तरह नहीं पड़ता
सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए
जब भी कोई राहगीर अपने चारों तरफ फैले घास की ओर निहारते हुए उसके बार-बार मिट जाने के बावजूद कायम रहने वाले वजूद को लेकर उससे गुफ्तगू करेगा तो घास भी पाश के शब्दों में उससे बात करते हुए कहेगी,
मैं घास हूँ
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊँगा
बम फेंक दो चाहे विश्‍वविद्यालय पर
बना दो होस्‍टल को मलबे का ढेर
सुहागा फिरा दो भले ही हमारी झोपड़ियों पर
मेरा क्‍या करोगे
मैं तो घास हूँ हर चीज़ पर उग आऊँगा
बंगे को ढेर कर दो
संगरूर मिटा डालो
धूल में मिला दो लुधियाना ज़िला
मेरी हरियाली अपना काम करेगी…
दो साल… दस साल बाद
सवारियाँ फिर किसी कंडक्‍टर से पूछेंगी
यह कौन-सी जगह है
मुझे बरनाला उतार देना
जहाँ हरे घास का जंगल है
मैं घास हूँ, मैं अपना काम करूँगा
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊँगा ।
जब राष्ट्रवाद के नाम पर व्यक्ति की हत्या कर दी जाएगी और देशहित के नाम पर लोगों के निजी हितों का हनन होने लगेगा। तब पाश अपने शब्दों के उड़नखटोले पर बैठकर हमें कहीं दूर ले जाएंगे और समझाएंगे कि
यदि देश की सुरक्षा यही होती है
कि बिना जमीर होना ज़िन्दगी के लिए शर्त बन जाए
आँख की पुतली में हाँ के सिवाय कोई भी शब्द
अश्लील हो
और मन बदकार पलों के सामने दण्डवत झुका रहे
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है ।
हम तो देश को समझे थे घर-जैसी पवित्र चीज़
जिसमें उमस नहीं होती
आदमी बरसते मेंह की गूँज की तरह गलियों में बहता है
गेहूँ की बालियों की तरह खेतों में झूमता है
और आसमान की विशालता को अर्थ देता है
हम तो देश को समझे थे आलिंगन-जैसे एक एहसास का नाम
हम तो देश को समझते थे काम-जैसा कोई नशा
हम तो देश को समझते थे कुरबानी-सी वफ़ा
लेकिन गर देश
आत्मा की बेगार का कोई कारख़ाना है
गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है
तो हमें उससे ख़तरा है
गर देश का अमन ऐसा होता है
कि कर्ज़ के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह
टूटता रहे अस्तित्व हमारा
और तनख़्वाहों के मुँह पर थूकती रहे
क़ीमतों की बेशर्म हँसी
कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो
तो हमें अमन से ख़तरा है
गर देश की सुरक्षा को कुचल कर अमन को रंग चढ़ेगा
कि वीरता बस सरहदों पर मर कर परवान चढ़ेगी
कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा
अक़्ल, हुक्म के कुएँ पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है ।
और जब हम टूट चुके होंगे सत्ता से संघर्ष करते-करते और अनगिनत प्रयासो के बावजूद हर बार हाथ लगती असफलताओं के बाद हमारे हताश, उदास और निराश मन में क्रांति की नई ज्वाला फूंकने के लिए पाश हमें संभालते हुए कहेंगे,
हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी, ग़ुलाम इच्छाओं के लिए
हम चुनेंगे साथी, ज़िन्दगी के टुकड़े
हथौड़ा अब भी चलता है, उदास निहाई पर
हल अब भी चलता हैं चीख़ती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता है, प्रश्न नाचता है
प्रश्न के कन्धों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी
क़त्ल हुए जज़्बों की क़सम खाकर
बुझी हुई नज़रों की क़सम खाकर
हाथों पर पड़े घट्टों की क़सम खाकर
हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे तब तक
जब तक वीरू बकरिहा
बकरियों का मूत पीता है
खिले हुए सरसों के फूल को
जब तक बोने वाले ख़ुद नहीं सूँघते
कि सूजी आँखों वाली
गाँव की अध्यापिका का पति जब तक
युद्ध से लौट नहीं आता
जब तक पुलिस के सिपाही
अपने भाइयों का गला घोंटने को मज़बूर हैं
कि दफ़्तरों के बाबू
जब तक लिखते हैं लहू से अक्षर
हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की ज़रूरत बाक़ी है
जब तक बन्दूक न हुई, तब तक तलवार होगी
जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की ज़रूरत होगी
और हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे
कि लड़े बग़ैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सज़ा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए
उनकी याद ज़िन्दा रखने के लिए
हम लड़ेंगे
इतना ही नही तो जब संविधान को सर्वोच्च और सर्वोपरि बताकर सरकारें तुम्हें अपने इशारों पर नचाने लग जाए, तब लोकतंत्र के नाम पर रची गई सारी नैतिकताओं को नेस्तानाबूत करते हुए पाश हमें बताएंगे कि क्यों संविधान को पढ़ना पशु बनना है,
संविधान
यह पुस्‍तक मर चुकी है
इसे मत पढ़ो
इसके लफ़्ज़ों में मौत की ठण्‍डक है
और एक-एक पन्‍ना
ज़िन्दगी के अन्तिम पल जैसा भयानक
यह पुस्‍तक जब बनी थी
तो मैं एक पशु था
सोया हुआ पशु
और जब मैं जागा
तो मेरे इन्सान बनने तक
ये पुस्‍तक मर चुकी थी
अब अगर इस पुस्‍तक को पढ़ोगे
तो पशु बन जाओगे
सोए हुए पशु ।
रोशन ‘सास्तिक’

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