काकोरी कांड के चलते फांसी के फंदे पर झूलने वाले चार शहीदों के आखिरी पलों की कहानी

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हर साल की तरह इस साल भी ‘9 अगस्त’ की तारीख हमारे दिलोदिमाग में ‘काकोरी कांड’ की याद को ताजा कर देती है। जब आजादी की लड़ाई के दौरान जारी असहयोग आंदोलन के दरम्यान ‘चौर-चौरी कांड’ में हुई हिंसा के बाद अपने ‘सत्याग्रह की शुद्धता’ को बचाए रखने के लिए गांधी जी ने एकदम से ‘असहयोग आंदोलन’ वापस ले लिया था। तब 9 अगस्त 1925 को हुए ऐतिहासिक काकोरी कांड ने गांधी जी के इस फैसले के चलते क्षुब्ध युवाओं के अंदर एक नई ऊर्जा का संचार करने का काम किया था।

काकोरी कांड को हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोशिएशन के दस क्रांतिकारी सदस्यों ने मिलकर अंजाम दिया था। इन नामों में रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, चंद्रशेखर आजाद, सचिंद्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, मनमठनाथ गुप्ता, मुरारी लाल गुप्ता, मुकुंदी लाल गुप्ता और बनवारी लाल का अहम था। इन सभी ने मिलकर काकोरी रेकवे स्टेशन के नजदीक ट्रेन रोककर अंग्रेजी हुकमत के खजाने को लूट लिया था। इस लूट के दो अहम मकसद थे। पहला अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में लगने वाले खर्च की जरूरत को पूरा करना और दूसरा अंग्रेजो को यह संदेश देना कि अब क्रांतिकारी अंग्रेजी हुकूमत से आर या पार के मूड में है।

उस दौर के हिसाब से करीब 4600 रुपए के इस लूट कांड में अंग्रेजी सरकार ने इस मामले में राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी और अशफाकुल्ला खान को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई। इसके अलावा सचिंद्र सान्याल और सचिंद्र बख्शी को कालापानी की सजा दी गई तथा अन्य 4 को 14-14 साल की सजा सुनाई गई। इस मामले में शामिल चंद्रशेखर आजाद तक अंग्रेजी हुकूमत नही पहुंच पाई थी। लेकिन 27 फरवरी 1931 की एक दोपहर इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों ने जब चंद्रशेखर आजाद को चारों तरफ से घेर लिया, तब उन्होंने अपनी बंदूक में बची आखिरी गोली से खुद को ही शहीद कर दिया।

ककोरी कांड के चलते जिन चार क्रांतिकारियों को फांसी के फंदे पर लटकना पड़ा, अगर हम उनके आखिरी समय की गतिविधियों पर एक नजर डाले। तो यह आसानी से समझ सकते है कि उस दौरान उन क्रांतिकारियों में देशभक्ति का जज़्बा कितने गहरे उतरा हुआ था। तो चलिए काकोरी कांड के चार अमर बलिदानियों के आखिरी लम्हों को जीते हैं;
17 दिसंबर 1927 के दिन क्रांतिकारी राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को गांडा जेल में फांसी दिए जाने का दिन मुकर्रर हुआ। अपनी फांसी के दिन से कुछ दिन पहले अपने एक मित्र को लिखे पत्र में वह लिखते है,‘मालूम होता है कि देश की बलिवेदी को हमारे रक्त की आवश्यता है। मृत्यु क्या है? जीवन की दूसरी दिशा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। यदि यह सच है कि इतिहास पलटा खाया करता है तो मैं समझता हूं, हमारी मृत्यु व्यर्थ नहीं जाएगी, सबको अंतिम नमस्ते!

इसके दो ही दिन बाद 19 सितंबर 1927 के दिन जब क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में फंसी की होने वाली थी। तब रामप्रसाद बिस्मिल के कदम फांसी के फंदे की तरफ बढ़ते हुए
मालिक तेरी रजा रहे और तू ही रहे,
बाकी न मैं रहूं, न मेरी आरजू रहे।

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जब तक कि तन में जान, रगों में लहू रहे
तेरा हो जिक्र या, तेरी ही जुस्तजू रहे।

यह गीत गुनगुना रहे थे। इसके बाद फांसी के तख़्त पर खड़े होकर उन्होंने कहा,”मैं ब्रिटिश साम्राज्य का विनाश चाहता हूं।” इतना कहकर वह मंत्र का जाप करते हुए फंदे से झूल गए।

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राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और रामप्रसाद बिस्मिल के बाद इलाहाबाद में क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह को फांसी के फंदे पर लटकाया गया। फांसी पर लटकने से पहले इन्होंने भी अपने मित्र को लिखे एक पत्र में कहा था,’हमारे शास्त्रों में लिखा है, जो आदमी धर्मयुद्ध में प्राण देता है, उसकी वही गति होती है जो जंगल में रहकर तपस्या करने वालों की।’

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इन दिनों के बाद अंग्रेजों ने जिस चौथे शख्स को फांसी के फंदे पर लटकाया उनका नाम था अशफ़ाक उल्ला खां। भारत मां के इस सिपाही ने भी फांसी के तख्ते पर खड़े होकर पहले फंदे को चूमा और फिर वहां खड़े लोगों को संबोधित करते हुए कहा,”मेरे हाथ इंसान खून से कभी नही रंगे, मेरे ऊपर जो इल्जाम लगाया गया, वो गलत है। ख़ुदा के यहां मेरा इंसाफ होगा।” इसके बाद वह
‘तंग आकर हम भी उनके जुल्म से बेदाद से

चल दिए सुए अदम जिंदाने फैजाबाद से’

यह गीत गाते हुए इस दुनिया से रुख़सत हो गए।

-रोशन सास्तिक

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