आतंकवाद: धार्मिक ध्येय को पूरा करने के उद्देश्य से की गई हिंसा

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सामान्यतः परिभाषाएं परिभाषा में परिभाषित शब्दों की परिभाषा को पूर्णतः परिभाषित करने के प्रयास में असफ़ल सिद्ध हो जाती है। यही कारण है कि कई ऐसी समस्याएं है जिनका समाधान तो दूर हम उनके संबंध में अब तक एक सर्वमान्य समझ तक नही बना पाए है। ‘आतंकवाद’ उन्हीं अपरिभाषित समस्याओं में से एक है। अलग-अलग जगह पर, अलग-अलग लोगों द्वारा, अलग-अलग समयकाल के दौरान, अलग-अलग परिपेक्ष्य में, अलग-अलग समझ के आधार पर आतंकवाद की अलग-अलग परिभाषा बताई और बनाई गई। कहने तो हम आज आतंकवाद को एक वैश्विक समस्या मानते है और इसके खिलाफ एकजुट होकर सामूहिक लड़ाई लड़ने की बात करते है। लेकिन बावजूद इसके दुनिया का वैश्विक मंच यानी संयुक्त राष्ट्र संघ भी पिछले 70 सालों में आतंकवाद को पूर्णतः परिभाषित नही कर पाया है। यानी अब तक हम आतंकवाद जैसी वैश्विक समस्या की वैश्विक परिभाषा तक नही बना पाए हैं।
आतंकवाद दरअसल हिंसात्मक माध्यम है अपनी बात को दूसरे तक पहुँचाने का। इसको और ज्यादा सही के समीप लेकर जाया जाए, तो आतंकवाद को हम अपनी बात को दुसरो पर थोपने का एक ‘हिंसात्मक हथियार’ भी कह सकते है। अगर कोई आदमी किसी विषय को लेकर बनाई गई अपनी समझ को आपके साथ साझा करता है, तो ठीक है। लेकिन अगर संबंधित विषय को लेकर वह अपनी व्यक्तिगत समझ आपको मानने के लिए मजबूर करता है और ऐसा करने के लिए हिंसा का सहारा लेता है, तो वह आतंकवाद है। कहने का मतलब अपनी सोच को समाज द्वारा स्वीकार्य बनाने के लिए उठाया गया हिंसात्मक कदम ‘आतंकवाद’ कहलाता है।
लेकिन ऊपर दी गई परिभाषा को आधार बनाकर यह तय किया जाने लगे कि आतंकवाद क्या है और कौन आतंकवादी है। तो फिर आपसे अपनी बात मनवाने के लिए आपके माता-पिता द्वारा आपको पिटे जाने का कृत्य भी आतंकवाद की श्रेणी में आ जाएगा। क्या आपके मम्मी-पापा आतंकवादी हैं? नहीं ना। लेकिन ऊपर तो हम इसी नतीजे पर पहुंच रहे थे ना कि अपनी बात को दुसरो पर थोपने के लिए हिंसा को हथियार के रूप में इस्तेमाल करना आतंकवाद है। तो क्या ऐसा करना आतंकवाद नहीं है? है ना ! फिर आपके माता-पिता भी तो आतंकवादी हुए ना! सर चकरा रहा है? अगर सर चकरा रहा है तो अब आपको यह समझ भी आ रहा होगा कि क्यों आतंकवाद को लेकर अब तक हम किसी सर्वमान्य परिभाषा तक नहीं पहुँच पाए।
चलिए आतंकवाद को समझने के लिए सवाल-जवाब का तरीका इस्तेमाल करते है। अगर कोई आपसे पूछे कि भगत सिंह कौन थे? तो आपका जवाब क्या होगा? इसमें कोई दोराय नहीं कि आप छाती ठोककर कहेंगे कि भगत सिंह देश की आजादी के लिए शहीद होने वाले वीर क्रांतिकारी थे। लेकिन क्या आप जानते है कि अंग्रेजों की नजर में वह एक आतंकवादी थे। इसपर आप गुस्से से लाल-पीले होकर यह सवाल खड़ा कर सकते है कि अपने देश की आजादी के लिए लड़ने वाला व्यक्ति आतंकवादी कैसे हो सकता है? लेकिन जब आपके भावनाओ का उफान किनारे लग जाए, तब आप खुद से यह सवाल करिएगा कि क्या आपके द्वारा कश्मीर की आजादी के लिए लड़ने वाले बुरहान वाणी को आतंकवादी ठहराए जाने पर उसके कश्मीरी समर्थक भगत सिंह के लिए आपके द्वारा इस्तेमाल किए गए तर्क का इस्तेमाल बुरहान वाणी के पक्ष में नहीं कर सकते? अंग्रेजो की नजर में जो आतंकी है वह आपके लिए क्रांतिकारी हो सकता हैं। तो फिर आपके द्वारा ठहराया गया आतंकी किसी के लिए मसीहा कैसे नहीं हो सकता?
मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि यहाँ मैं भगतसिंह और बुरहान वाणी को एक तराजू में तौलकर नहीं देख रहा। मेरा उद्देश्य यहाँ इन दोनों का तुलनात्मक अध्यन करना भी नहीं है। मैं बस इस उदाहरण से यह बात समझाना चाहता हूँ कि किसी चीज को हम आतंकवाद कहेंगे या नहीं यह सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करता की उसमे हिंसा हो रही है या नहीं। मामला इस आधार पर तय होता है कि संबंधित हिंसा हमे प्रभावित कैसे कर रही है। अगर सिर्फ हिंसा करना ही आतंकवाद होता, तो सबसे बड़े आतंकवादी तो सभी देश की सेनाएं होती। लेकिन क्या हम अपनी सेना को आतंकवादी कहते है? हां, हम दुश्मन देश की सेना को जरूर आतंकवादी कहकर संबोधित करते है। कहने का मतलब यही निकला कि अगर किसी हिंसा से हमारी रक्षा हो रही है, उससे हमारा लाभ हो रहा है तो उस हिंसा को हम न तो आतंकवाद कहेंगे और ना ही उसे करने वाले को आतंकवादी। उलटे अपने देश के जवान के एक सर के बदले दुश्मन देश के दस जवानों के सर धड़ से अलग करने की हिंसात्मक मांग हम खुद करते है।
मोटामोटी देखा जाए तो अक्सर धर्म को केंद्र में रखकर की गई सामूहिक हिंसा को आतंकवादी घटना कहा जाता है। हिंसात्मक मामला अगर जल, जंगल, जमीन से जुड़ा हो तो नक्सलवाद, प्रवासी-अप्रवासी से जुड़ा हो तो प्रांतवाद, राज्य से अलग होने को की मांग से जुड़ा हो तो अलगाववाद, नस्ल और रंग से जुड़ा हो तो कट्टरवाद कहलाता है। उदाहरण के लिए अगर कोई किन्ही कारणों के चलते तनावग्रस्त होकर सड़क पर चल रहे दर्जनों बेगुनाह लोगो को अपनी गाडी से कुचल  मौत के घाट उतार दे। तो हिंसा होने के बावजूद हम इस घटना को ना आतंकवाद कहेंगे और ना ही ऐसा करने वाले को आतंकी। लेकिन अगर यही सब कुछ धर्म के नाम पर किया गया जाए, तो हम इसे एक आतंकवादी घटना और इसको अंजाम देने वाले आदमी को आतंकी घोषित करने में एक पल भी नही गवाएंगे। अमेरिका में आए दिन कुछ सनकी लोगो द्वारा भीड़भाड़ वाले इलाके में गोलीबारी करने की खबरे आती रहती है। लेकिन आपने कभी इन खबरों में आतंकी और आतंकवादी जैसे शब्दों का इस्तेमाल होते नहीं देखा होगा। कहने का तात्पर्य जब तक किसी हिंसात्मक कार्य के पीछे धर्म कारक ना हो। तब तक सामान्यतः उसे हिंसात्मक घटना को आतंकवाद से जोड़ कर नहीं देखा जाता।
~ रोशन ‘सास्तिक’

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