आजाद भारत के सबसे बड़े जननायक जय प्रकाश नारायण के जन्मदिन पर पढ़िए उनकी कविता

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आज उस महान शख्सियत का जन्मदिन है, जिसके द्वारा चलाए गए आंदोलन ने उन नेताओं को जन्म दिया, जो आज भारतीय राजनीति के शीर्ष पर काबिज है। जी हां, हम बात कर रहे हैं उस जना यानी जय प्रकाश नारायण की, जिसने जब दिल्ली के रामलीला मैदान से तानाशाही सरकार के खिलाफ ‘सिंहासन छोड़ों की जनता आती है!’ का नारा दिया, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इतना डर गई कि अगले ही दिन उन्होंने भारत में आपातकाल की घोषणा कर दी। अब तक तो आप जान गए होंगे कि अपने समय में जय प्रकाश नारायण कितने शक्तिशाली शख्सियत रहे होंगे। 11 अक्टूबर 1902 को जन्में जय प्रकाश नारायण अगर आज जिंदा होते, तो 116वां जन्मदिन मना रहे होते। अफ़सोस कि लोकनायक की उपाधि से नवाजे गए जय प्रकाश नारायण 77 साल की उम्र में 8 अक्टूबर 1979 को दुनिया को अलविदा कह गए। तो चलिए आजाद भारत के सबसे बड़े जननायक के जन्मदिन पर आज हम उनकी लिखी एक कविता के माध्यम से उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। 
 
Image result for जय प्रकाश नारायणएक चिड़ा और एक चिड़ी की कहानी
एक था चिड़ा और एक थी चिड़ी
एक नीम के दरख़्त पर उनका था घोंसला
बड़ा गहरा प्रेम था दोनों में
दोनों साथ घोंसले से निकलते
साथ चारा चुगते,
या कभी-कभी चारे की कमी होने पर
अलग अलग भी उड़ जाते ।
और शाम को जब घोंसले में लौटते
तो तरह-तरह से एक-दूसरे को प्यार करते
फिर घोंसले में साथ सो जाते ।
एक दिन आया
शाम को चिड़ी लौट कर नहीं आई
चिड़ा बहुत व्याकुल हुआ ।
कभी अन्दर जा कर खोजे
कभी बैठ कर चारों ओर देखे,
कभी उड़के एक तरफ़, कभी दूसरी तरफ़
चक्कर काट के लौट आवे ।
अँधेरा बढ़ता जा रहा था,
निराश हो कर घोंसले में बैठ गया,
शरीर और मन दोनों से थक गया था ।
उस रात को चिड़े को नींद नहीं आई
उस दिन तो उसने चारा भी नहीं चुगा
और बराबर कुछ बोलता रहा,
जैसे चिड़ी को पुकार रहा हो ।
दिन-भर ऐसा ही बीता ।
घोंसला उसको सूना लगे,
इसलिए वहाँ ज्यादा देर रुक न सके
फिर अँधेरे ने उसे अन्दर रहने को मजबूर किया,
दूसरी भोर हुई ।
फिर चिड़ी की वैसी ही तलाश,
वैसे ही बार-बार पुकारना ।
एक बार जब घोंसले के द्वार पर जा बैठा था
तो एक नयी चिड़ी उसके पास आकर बैठ गई
और फुदकने लगी ।
चिड़े ने उसे चोंच से मार मार कर भगा दिया ।
फिर कुछ देर बाद चिड़ा उड़ गया
और उड़ता ही चला गया
उस शाम को चिड़ा लौट कर नहीं आया
वह घोंसला अब पूरा वीरान हो गया
और कुछ ही दिनों में उजड़ गया
कुछ तो हवा ने तय किया
कुछ दूसरी चिड़िया चोचों में
भर-भर के तिनके और पत्तियाँ
निकाल ले गईं ।
अब उस घोंसले का नामोनिशां भी मिट गया
और उस नीम के पेड़ पर
चिड़ा-चिड़ी के एक दूसरे जोड़े ने
एक नया घोंसला बना लिया ।
(९ सितम्बर १९७५, ‘मेरी जेल डायरी’ से)

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