अब तो समझ जाइये, धर्म के नाम पर पर्यावरण को हानि पहुँचाना बंद करिये

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जाने कितने ख़तरनाक है पीओपी से बने गणपति, और क्यों जरूरी हैं इको फ्रेंडली गणपति ।

गणेश उत्सव का समापन हो चुका है।समुन्दर किनारे हर दिन कुछ मरी हुई मछलियाँ और कुछ टूटी हुई मूर्तियाँ आपको नज़रआ जाएँगी।कुछ लोग जागरूक होकर साफ़ सफ़ाई भी कर रहे है। लेकिन अगले वर्ष फिर गणेशोत्सव में वही होगा जो सालों सेहोता आ रहा है ।

बप्पा का इंतजार करने वालो की उनसे यही कामना होती है कि गणपति बप्पा उनकी जिंदगी से सारी परेशानियों को अपनेआशीर्वाद से छूमंतर कर उनके जीवन में खुशियां ही खुशियां भर दें। जब ऐसा है तो फिर सवाल उठता है कि हमारी परेशानियोंको दूर वाले बप्पा की प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियों का इस्तेमाल कर हम पर्यावरण और उसमे रहने वाले प्राणियों कोजिंदगी को परेशानी में क्यों डाले?

जब हम बप्पा से अपने लिए मंगल कामना की उम्मीद रख रहें है तो फिर प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी बप्पा की मूर्ति के इस्तेमालका क्या तुक? क्योंकि जब प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियां विराजमान की जाएंगी तो उसका विसर्जन भी किसी तालाब, नदीया फिर समुद्र में ही होगा। और इससे होगा यह कि प्लास्टर ऑफ पेरिस जैसा हानिकारक रसायन पानी में घुल कर पानी मे रहनेवाले जीवों का जीवन तबाह कर देगा। अब अपने मंगल के लिए किसी और के जीवन को अमंगल करना तो कतई सही नहीं हैना।

इससे बेहतर यह होगा कि या तो हम सभी इको फ्रेंडली गणपति का इस्तेमाल करे या फिर अगर किन्हीं कारणों से ऐसा संभवनही हो पाता है तो प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी बप्पा की मूर्ति को प्राकृतिक जलाशयों की बजाय कृतिम तालाबों में ही विसर्जितकर दें। जिससे होगा यह कि तालाब, नदी और समुद्र जैसे प्राकृतिक जलाशयों में प्लास्टर ऑफ पेरिस जैसा खतरनाक रसायननही घुल पाएगा। और इससे जलीय जीवन को होने वाले जानलेवा नुकसान से भी बचाया जा सकता है। अब सवाल यह उठता हैकि प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियों की बजाय इको फ्रेंडली गणपति का इस्तेमाल इतना जरुरी क्यों है? और अगर सच मेंजरुरी है, तो अब तक इस दिशा में किसने और कितने कारगर कदम उठाएं है?

चलिए हम पहले जान लेते हैं कि प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियों की बजाय मिट्टी से बनी मूर्तियों का इस्तेमाल करना क्योंजरूरी है। दरअसल प्लास्टर ऑफ पेरिस को जब पानी में मिक्स किया जाता है तो ये मुलायम, सफेद, चिपचिपे जिप्सम में बदलजाता है। और फिर पीओपी अपनी हार्डनेस के चलते पानी में काफी धीरे-धीरे घुलता है। आप यह जानकर हैरत में रह जाएंगे किपीओपी के पार्टिकल्स को पानी में पूरी तरह घुलने में तकरीबन 17 साल का समय लग जाता है। सिर्फ पीओपी से बनी मूर्ति हीनहीं तो मूर्ति को आकर्षक बनाने के लिए ऑर्गेनिक रंगों की बजाय इस्तेमाल में लाए गए लेड और आर्सेनिक वाले मेटालिक पेंट्सभी पानी मे घुलने के बाद जलीय जीवन के लिए जहर का काम करते हैं।

ज्ञात रहे कि जिन सस्ते सिंथेटिक रंगों के जरिए हम अपने बप्पा की मूर्तियों को रंगों से सरोबार कर देते हैं। वहीं रंग पानी मे घुलनेके बाद हैवी मेटल मसलन लेड, आर्सेनिक, मरकरी, कैडियम, जिंक ऑक्साइड और क्रोमियम जैसे पदार्थों से पानी को इतनाप्रदूषित कर देता है कि पानी में ऑक्सीजन, कार्बन डाई ऑक्साइड का लेवल कम हो जाता है। कई बार तो यह लेवल इतनी बुरीतरह प्रभावित होता है कि पानी में मछलियों और दूसरे जीव-जतुंओं के जान पर बन आती है। अब आप खुद यह तय करकेबताइए कि क्या मतलब ऐसे रंगों का जो दूसरों के जीवन को बदरंग कर दे। इसी के चलते कई लोगों ने प्लास्ट ऑफ पेरिस कीबजाय मिट्टी से बनी मूर्ति का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया हैं।

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